PTB Big न्यूज़ चंडीगढ़ : लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) को एक 43 वर्षीय युवती की मौत पर उसके भाई को नॉमिनी होने के बावजूद क्लेम न देना महंगा पड़ा है। LIC ने कहा था कि दूसरी पॉलिसी में इंश्योर्ड ने पहली पॉलिसी का जिक्र नहीं किया था। वहीं जालंधर के निचले आयोग ने शिकायत को रद्द करते हुए इंश्योर्ड की बीमारी की जानकारी LIC को न बताने की बात कही थी। इसके चलते क्लेम से जुड़ी शिकायत को रद्द कर दिया गया था। हालांकि पंजाब राज्य उपभोक्ता आयोग ने अपील केस में इस शिकायत को मंजूर कर लिया।
आयोग ने निचले आयोग के फैसले को रद्द करते हुए LIC को आदेश दिए हैं कि शिकायतकर्ता को दूसरी पॉलिसी का 6.25 लाख रुपए क्लेम 9 प्रतिशत ब्याज दर सहित दे। वहीं शिकायतकर्ता को हुई मानसिक पीड़ा और शोषण के चलते हर्जाना और अदालती खर्च के रूप में 30 हजार रुपए देने को कहा है। आयोग के प्रैजिडेंट जस्टिस दया चौधरी ने यह फैसला दिया है।
जालंधर के अर्बन एस्टेट, फेज 1 के अमित कुमार (44) ने लाइफ इंश्योरेंस कारपोरेशन ऑफ इंडिया(LIC), इसके न्यू दिल्ली स्थित ज़ोनल मैनेजर और जालंधर के PUDA काम्प्लैक्स में बने ऑफिस के ब्रांच मैनेजर को पार्टी बनाते हुए अपील दायर की थी। अमित ने जिला उपभोक्ता आयोग, जालंधर के 9 फरवरी, 2021 के आदेश को चुनौती दी थी। इसमें उनकी शिकायत को रद्द कर दिया गया था। शिकायतकर्ता के मुताबिक उनकी बहन पूनम कपूर(43) ने LIC की दो पॉलिसियां ‘जीवन सरल’ ली हुई थी। इनमें से एक 11 अगस्त, 2012 एवं दूसरी 21 सितंबर, 2012 को ली थी। इनकी मैच्योरिटी वर्ष 2037 में होनी थी। पूनम की 21 फरवरी, 2014 को मृत्यु हो गई थी। नॉमिनी होने के नाते शिकायतकर्ता ने LIC से क्लेम मांगा।
LIC ने 11 अगस्त, 2012 वाली पॉलिसी का क्लेम तो दे दिया मगर दूसरी पॉलिसी का क्लेम देने से इंकार कर दिया था। इसके पीछे कहा गया कि दूसरी पॉलिसी में पहली पॉलिसी के बारे में जानकारी नहीं दी गई थी। वहीं शिकायतकर्ता पक्ष का कहना था कि LIC एजेंट को दूसरी पॉलिसी के दौरान पहली पॉलिसी की पूरी जानकारी दी गई थी। यदि कोई चूक हुई है तो वह LIC या इसके एजेंट की तरफ से हुई है।
वहीं LIC ने अपने जवाब में शिकायतकर्ता को नॉमिनी तो माना था मगर कहा था कि क्लेम का हकदार नहीं है। वहीं अन्य दलीलें दी गई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जिला उपभोक्ता आयोग, जालंधर ने शिकायत को रद्द कर दिया था। अपील केस में शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि निचले आयोग ने साक्ष्यों व दलीलों को सही रुप से नहीं देखा। कहा गया कि सिर्फ इस आधार पर दूसरी पॉलिसी का क्लेम खारिज कर दिया गया कि प्रोपोज्ड फार्म में पूनम ने पहली पॉलिसी की जानकारी नहीं दी।
निचले आयोग ने शिकायत को रद्द करते हुए नया मुद्दा इसमें उठा दिया था कि इंश्योर्ड पहले से बीमारी से ग्रसित थी। इस पर शिकायतकर्ता ने कहा कि अगर ऐसा भी है तो पहली पॉलिसी में क्लेम मिला है तो दूसरी का भी मिलना चाहिए था। पहली पॉलिसी को लेने के दौरान LIC ने विस्तृत जांच की थी और क्लेम पूर्व बीमारी के कारण को लेकर रद्द नहीं किया था। इंश्योर्ड ने एजेंट को पूरी जानकारी दी थी। प्रोपोज्ड फॉर्म भरते वक्त कोई जानकारी नहीं छिपाई गई थी। वहीं इंश्योर्ड किसी भी पूर्व बीमारी से ग्रसित नहीं थी। LIC के वकील ने कहा कि प्रोपोज्ड फार्म में पुरानी पॉलिसी का कॉलम नहीं भरा गया था।
वहीं इंश्योर्ड के पटेल हॉस्पिटल, जालंधर में 15 मई, 2013 को भर्ती होने की बात बताई गई। अगले दिन वह डिस्चार्ज हो गई थी। डिस्चार्ज समरी में ट्यूबरस स्लेरोसिस और क्रोनिक रीनल फेलियर विद अनीमिया बताया गया था। 2 सालों से इंश्योर्ड को यह दिक्कत थी। बीमारी के इन तथ्यों को फॉर्म भरते वक्त नहीं बताया गया। इंश्योर्ड अपनी बीमारी के बारे में जानती थी। वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता पक्ष ने मेडिकल अटेंडेंट सर्टिफिकेट का हवाला देते हुए कहा कि बीमारी के दौरान पहली कंसलटेशन 19 अप्रैल, 2013 की थी। वहीं इंश्योर्ड ने जीवन सरल पॉलिसियां वर्ष 2012 में ली थी। कहा गया कि इंश्योर्ड को बीमारी का वर्ष 2013 में पता चला था। ऐसे में कोई पुरानी बीमारी की बात नहीं छिपाई गई थी।
राज्य उपभोक्ता आयोग ने निचले आयोग द्वारा केस को रद्द किए जाने पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि पॉलिसी लेने और बीमारी का पहली बार पता चलने की तारीख संबंधी जानकारियों पर विचार नहीं किया। वहीं अगर यह पहले से किसी बीमारी (प्रि-एग्जीसटेंस डीसिज़) का केस होता तो जांच और मेडिकल एग्जामिनेशन का विषय बनता एवं क्लेम स्वीकार नहीं किया जाना बनता और शुरुआती स्तर पर ही इसे रद्द कर दिया गया होता। वहीं पहली पॉलिसी का क्लेम दे दिया गया। वहीं LIC कोई सबूत पेश करने में फेल रही कि इंश्योर्ड पॉलिसी से पहले किसी पुरानी बीमारी से ग्रसित थी।
आयोग ने कहा कि इंश्योरेंस रेग्युलेटरी डेवलपमेंट ऑफ इंडिया को इंश्योरेंस कंपनियों को कुछ निर्देश/एडवाइजरी देने के लिए कुछ आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। इसके तहत इंश्योरेंस कंपनियों को आदेश दिए जाए कि प्रोपोज्ड फॉर्म में मोटे अक्षरों में सबसे ऊपर वर्णाकुलर भाषा(हिंदी/पंजाबी आदि) में जानकारी दे। इससे वास्तविक क्लेम रद्द नहीं हो पाएंगे। इस जानकारी को ‘मैटीरियल इन्फॉर्मेशन’ के नाम से दिया जाए। फॉर्म के हर पन्ने पर इंश्योर्ड के दस्तखत हों। एजेंट द्वारा इसकी जांच की जाए। इससे ग्राहकों/उपभोक्ताओं का शोषण होना खत्म हो सकेगा। इस संबंध में जागरूकता के लिए पब्लिक साइट्स पर डिस्प्ले बोर्ड होने चाहिए।








































