PTB News “हेल्थ” : मां बनना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है लेकिन कुछ महिलाएं इस सुख से वंचित रह जाती हैं, हालांकि आजकल महिलाओं को मां बनने में किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता। कृत्रिम प्रक्रिया जैसे आईवीएफ (IVF), आईसीएसआई (ICSI) और आईयूआई (IUI) जैसी कई तकनीक के जरिए महिलाएं भी मां बनने का सपना पूरा कर सकती हैं।
इस मामले में अधिक रौशनी डालते हुए PTB News की टीम को ST Hospital & Infertility Centre in Jalandhar के MD Dr Asheesh Kapoor ने जानकारी देते हुए बताया कि आईवीएफ यानि टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक ऐसी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन है, जिसमें महिलाओं के गर्भाश्य में दवाइयों व इंजैक्शन द्वारा सामान्य से ज्यादा अंधिक अंडे बनाए जाते हैं, फिर सर्जरी के जरिए अंडो को लैब में कल्चर डिश में तैयार पति के शुक्राणुओं के साथ मिलाकर निषेचन (Fertilization) के लिए 2-3 दिन रखा जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया में अल्ट्रासाउंड का इस्तेमाल किया जाता है, आखिर में जांच के बाद इससे बने भ्रूण को वापिस महिला के गर्भ में इम्प्लांट किया जाता है। बच्चेदानी में भ्रूण इम्प्लांट करने के बाद 14 दिनों में ब्लड या प्रेगनेंसी टेस्ट के जरिए इसकी सफलता और असफलता का पता चलता है। इससे महिला के मां बनने के संभावना करीब 70% तक होती है।

वहीं डॉ रिम्मी महाजन जोकि ST Hospital & Infertility Centre in जालंधर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं ने बताया की आईयूआई (Intrauterine Insemination) कृत्रिम प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी देते हुए बताया कि गर्भधारण करने का एक तरीका यह भी है। इस प्रक्रिया में पहले पुरुष के शुक्राणुओं को साफ किया जाता है, फिर महिला के ओव्यूलेशन के समय डॉक्टर प्लास्टिक की पतली कैथेटर ट्यूब के जरिए इन शुक्राणुओं को गर्भाशय में इंजेक्ट कर देते हैं। मगर इससे पहले गर्भधारण कर रही महिला को अंडे का उत्पादन करने और ओव्यूलेशन को उत्तेजित करने के लिए प्रजनन दवाइयों का सेवन करना होता है, ताकि गर्भ में भ्रूण बन सके।
वहीं डॉ आशीष कपूर ने आगे आईसीएसआई तकनीक के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस तकनीक के द्वारा पुरूष के बांझपन का इलाज किया जाता है, हालांकि, आईसीएसआई को आईवीएफ की भांति किया जाता है, लेकिन जिन पुरूषों में शुक्राणों की कमी होती है, उनके लिए IVF फायदेमंद नहीं होता। ऐसे में उनके लिए सबसे आईसीएसआई ट्रीटमेंट सही होता है। आईसीएसआई में पुरूष के शुक्राणु को अंडाणु में इंजेक्ट किया जाता है, ताकि उससे अंडाणु फर्टिलाइज हो सके।
IVF तकनीक में अंडों और स्पर्म को एक ट्यूब में फर्टिलाइज्ड होने के लिए रख दिया जाता है जबकि ICSI में, स्पर्म को सीधे एग्स में इंजेक्ट किया जाता है। वहीं, IUI में मेल शुक्राणुओं को साफ करके महिला के गर्भाश्य में इंजेक्ट किया जाता है, जिसके बाद अंडे फर्टिलाइज्ड हो जाते हैं। हालांकि IUI तकनीक IVF और ICSI दोनों से सस्ती और आसान है। IVF और ICSI की बात की जाए तो यह दोनों ही IUI तकनीक से थोड़ी सी मंहगी होती हैं। अगर कोई भी नि:संतान दंपति बाँझपन कि समस्या से जूझ रहा है तो वह हमारे अस्पताल ST Hospital & Test Tube Baby Centre Fertility Treatment In जालंधर में या हमारी वेबसाइट www.sthospital.in के माध्यम से या सीधे हमारे अस्पताल के फ़ोन नंबर +91-9915402525, 91-181-5042525 पर सम्पर्क कर सकता है।

डॉ आशीष कपूर ने आगे बताया कि कुछ लोग समझते हैं कि आईवीएफ या आईयूआई प्रक्रिया में बच्चा आपका नहीं होता, लेकिन यह बहुत गलत धारणाएं हैं। इसमें अंडा पत्नी और शुक्राणु पति के ही होते हैं। इस ट्रीटमेंट से पैदा होने वाला बच्चा पति-पत्नी का ही होता है। ज्यादा उम्र में भी मां बनने के लिए ये तकनीकें फायदेमंद है। दरअसल, 40 साल के बाद महिलाओं में कंसीव करने की क्षमता 10% घट जाती है। वहीं यह समय मेनोपॉज का भी होता है, जिसकी वजह से कंसीव करने में दिक्कत आती है। अगर महिलाएं इस उम्र में कंसीव कर भी ले तो भी गर्भपात या प्रीमैच्चोर डिलीवरी का खतरा रहता है।
ऐसी स्थिति में डोनर के अंडे एवं पीटीआई के शुक्राणु लेकर IVF विधि द्वारा ऐसे जोड़ों को संतान सुख की प्राप्ति करवाई जाती है और जिन जोड़ों में पति के शुक्राणु बिलकुल भी नहीं बनते उन में डोनर स्पर्म्स के जरिये IUI या IVF विधियों द्वारा संतान सुख की प्राप्ति होती है। IVF में 12-14 दिन बाद तकनीक की सफलता का पता चल जाता है। IUI ट्रीटमेंट में भी 12-14 दिन बाद ही रिजल्ट मिलता है। IUI IVF एवं ICSI इन तीनों ही विधियों में 12 से 14 दिनों में इनकी सफलता का पता ब्लड या यूरिन टेस्ट से चल जाता है।








































