PTB City न्यूज़ जालंधर (संपादक) राणा हिमाचल : हाल ही में जालंधर प्रेस क्लब में हुई हिंसक झड़प और उसके बाद लिए गए सख्त निर्णयों ने पत्रकारिता जगत में आत्म-मंथन की एक गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। एक अस्पताल से रिश्वत के लेनदेन को लेकर शुरू हुआ विवाद न केवल क्लब की चौखट तक पहुँचा, बल्कि उसने उस संस्था की गरिमा को भी तार-तार कर दिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है।
.आपको बता दें कि प्रेस क्लब की गवर्निंग कमेटी और पंजाब प्रेस क्लब के प्रधान सैनी द्वारा लिया गया निर्णय—गैर-सदस्यों की एंट्री पर प्रतिबंध और सदस्यों के लिए पहचान पत्र अनिवार्य करना समय की मांग थी। यह कदम क्लब की सुरक्षा और अनुशासन को बहाल करने के लिए अनिवार्य था। क्लब में अब केवल वही लोग प्रवेश कर सकेंगे और प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाग ले सकेंगे जो क्लब के अधिकृत सदस्य हैं। यह स्पष्ट है कि प्रेस क्लब कोई सार्वजनिक स्थल नहीं, बल्कि एक पेशेवर संस्थान है, जहाँ केवल मीडियाकर्मियों को ही स्थान मिलना चाहिए।
. .आपको यह भी बता दें कि इस पूरे विवाद का सबसे चिंताजनक पहलू वह अस्पताल है, जहाँ से यह सारा झगड़ा शुरू हुआ। क्या यह महज एक इत्तेफाक है, या पत्रकारिता के नाम पर चल रहे ‘वसूली तंत्र’ का एक और उदाहरण? जिस तरह से अस्पताल के साथ धन के लेनदेन की खबरें सामने आई हैं, उसने पत्रकारिता करने वाले उन तमाम ईमानदार लोगों की छवि पर दाग लगा दिया है, जो वर्षों से समाज में निडर और निष्पक्ष पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जब तथाकथित पत्रकार ‘खबर’ के बजाय ‘पैसे’ को प्राथमिकता देने लगते हैं, तो वे केवल अपना ही नहीं, बल्कि पूरी बिरादरी का अहित करते हैं।
.पिछले कुछ वर्षों में, गैर-पत्रकारों (जो पत्रकारिता के नाम पर अपनी दुकानें चला रहे हैं) की दखलअंदाजी ने समाज के मन में मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक-दो लोगों की काली करतूतों का खामियाजा पूरे पत्रकार समाज को भुगतना पड़ता है। समाज में हमारी छवि उस आईने की तरह है जिस पर अब धूल जमने लगी है।
. .प्रेस क्लब जैसे संस्थानों को केवल एंट्री बंद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह समय पत्रकारिता के भीतर व्याप्त इस ‘अशुद्धि’ के खिलाफ एक बड़ा और कठोर कदम उठाने का है। वहीं अस्पताल से जुड़े इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जो भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी संगठन से जुड़ा हो, यदि उसने पैसे लेकर पत्रकारिता की मर्यादा को कलंकित किया है, तो उसे सार्वजनिक रूप से बेनकाब किया जाना चाहिए। पत्रकारों के संघों को अब एकजुट होकर यह संदेश देना होगा कि पत्रकारिता का अर्थ ‘ब्लैकमेलिंग’ नहीं, बल्कि जनहित है।
. .यह बहुत जरूरी होगा कि अगर समय रहते इन “गैर-पत्रकारों” और “दलालों” को मीडिया की मुख्यधारा से अलग नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आम जनता का भरोसा मीडिया से पूरी तरह उठ जाएगा। प्रेस क्लब का यह निर्णय एक शुरुआत है, लेकिन असल लक्ष्य पत्रकारिता के उस खोए हुए सम्मान को पुनः प्राप्त करना है, जिस पर आज समाज के हर वर्ग की नजरें टिकी हुई हैं।








































