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पंजाब की सियासत में ‘गद्दारी’ बनाम ‘रणनीति’: क्या सुरक्षा का खेल, जनता पर पड़ेगा भारी?

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PTB Big राजनीति पंच जालंधर (संपादक) राणा हिमाचल : ​पंजाब की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहां आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपने चरम पर है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों के भाजपा में शामिल होने के बाद, ‘आप’ ने इसे ‘गद्दारी’ करार देते हुए सड़कों पर मोर्चा खोल दिया है। पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा इन्हें ‘पंजाब की पीठ में छुरा घोंपने वाला’ कहा जाना यह दर्शाता है कि पार्टी अब आक्रामक बचाव की मुद्रा में है।

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इस पूरे घटनाक्रम में एक बेहद गंभीर और विचारणीय पहलू सुरक्षा व्यवस्था का है। कल तक जिन नेताओं के लिए पंजाब सरकार यह दावा करती थी कि उन्हें जान का बड़ा खतरा है, उन्हें ‘Z+’ जैसी VIP सुरक्षा दी गई थी, लेकिन जैसे ही उन्होंने पाला बदला, सरकार ने बिना समय गंवाए यह सुरक्षा वापस ले ली। वहीं, दूसरी ओर अब उन्हें केंद्र की सुरक्षा मिल रही है।

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​यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुरक्षा का यह पैमाना आखिर ‘खतरे’ पर आधारित है या ‘राजनीतिक निष्ठा’ पर? एक तरफ राज्य की सुरक्षा वापस ली गई और दूसरी तरफ केंद्र ने उन्हें सुरक्षा घेरे में लिया। इस ‘सुरक्षा के खेल’ में अंततः खर्च तो जनता की गाढ़ी कमाई यानी टैक्स के पैसों का ही हो रहा है। क्या जनता पर यह दोहरा बोझ नहीं है? एक तरफ राज्य की सुरक्षा में किया गया खर्च बेकार गया, और दूसरी तरफ अब केंद्रीय सुरक्षा के नाम पर फिर से खजाना खाली हो रहा है। क्या जनता की सुरक्षा सिर्फ नेताओं की कुर्सी और पार्टी बदलने तक ही सीमित रह गई है?

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यह भी पढ़ें : सियासी धमाकों का साल 2026 : क्या 2027 के महासंग्राम में जनता ‘दलबदल’ पर करेगी बड़ा प्रहार?

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आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता अब इन नेताओं के खिलाफ सड़कों पर है। पार्टी का यह प्रयास है कि 2027 के चुनावों से पहले जनता के बीच एक ‘नैतिक नैरेटिव’ सेट किया जाए। वहीं, भाजपा इन नेताओं को गले लगाकर पंजाब में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, यह कदम भाजपा के लिए ‘दोधारी तलवार’ साबित हो सकता है। यदि जनता को यह लगा कि भाजपा सिर्फ दूसरे दलों के नेताओं को तोड़ने में लगी है और सुरक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था का राजनीतिकरण हो रहा है, तो 2027 में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

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वहीं कई राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि दलबदल और सुरक्षा को लेकर हो रही यह सियासत 2027 के लिए एक चुनौतीपूर्ण माहौल तैयार कर रही है। ‘आप’ पार्टी अपनी पंजाब व अन्य राज्यों में साख बचाने की लड़ाई लड़ रही है, तो भाजपा सत्ता के समीकरण बदलने की जुगत में है। लेकिन, पंजाब का जागरूक मतदाता हमेशा से ही राजनीति से ऊपर उठकर फैसले लेता आया है। यह ‘गद्दारी बनाम विकास’ और ‘सुरक्षा बनाम सियासत’ की जंग अब पूरी तरह से ‘जनता की अदालत’ में है।

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अब इन सभी के पीछे देखना यह बहुत ही दिलचस्प होगा कि क्या आम आदमी पार्टी की यह मुहिम और सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल आगामी चुनावों में ‘आप’ के लिए सहानुभूति बटोर पाएंगे? या फिर भाजपा के पाले में गए इन नेताओं का ‘केंद्रीय सुरक्षा कवच’ उन्हें जनता का विश्वास दिला पाएगा? जो भी हो, इस पूरे घटनाक्रम में जो ‘हर्जाना’ भुगतना पड़ रहा है, वह अंततः पंजाब की आम जनता को ही अपनी जेब से देना पड़ रहा है। 2027 में ‘जनता जनार्दन’ ही यह तय करेगी कि क्या वे इस ‘सियासी तमाशे’ को और झेलना चाहती है।

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आपको यह भी बता दें कि जब से बीजेपी में आप पार्टी के सांसदों ने एंट्री मारी है तब से लेकर अभी तक रोजाना आप पार्टी के नेता हाईकमान के इशारे पर लगातार आप पार्टी द्वारा कहे जाने वाले “गद्दारों” जिनमें राघव चड्ढा, ​संदीप पाठक, ​अशोक मित्तल, ​हरभजन सिंह, ​राजिंदर गुप्ता, ​विक्रम साहनी, ​स्वाति मालीवाल, के घरों का घेराव करने के साथ-साथ अब उनके व्यापारिक स्थानों के बाहर भी धरना प्रदर्शन करने में लगे हुए हैं। हालांकि आज कई नेताओं को केंद्रीय सुरक्षा मुहैया करवा दी गई है, लेकिन फिर भी 2027 से पहले अचानक आप छोड़ बीजेपी में शामिल होने वाले इन नेताओं के साथ-साथ कइयों की साथ चुनावों से पहले बचेगी या फिर कई और नेता भी आप का दामन छोड़कर बीजेपी में जल्द हो जायेंगे शामिल।

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