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सियासी धमाकों का साल 2026: क्या 2027 के महासंग्राम में जनता ‘दलबदल’ पर करेगी बड़ा प्रहार?

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PTB Big Exclusive न्यूज़ जालंधर (संपादक) राणा हिमाचल : भारतीय राजनीति में विचारधारा की प्रतिबद्धता पर स्वार्थ की विजय का खेल कोई नया नहीं है, लेकिन आम आदमी पार्टी (AAP) के सात सांसदों का अचानक पाला बदलकर भाजपा में शामिल होना न केवल ‘आप’ पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह देश की राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘जनविश्वास’ के क्षरण का एक और दुखद अध्याय भी है।

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यह घटनाक्रम तब सामने आया है जब केंद्रीय जांच एजेंसियों, विशेषकर प्रवर्तन निदेशालय (ED) का शिकंजा कुछ प्रभावशाली चेहरों के करीब पहुंच रहा था। ऐसे में इन सात सांसदों का भाजपा में प्रवेश राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है कि क्या यह अंतरात्मा की आवाज है, या फिर जांच की तपिश से बचने के लिए ढूँढा गया एक ‘सुरक्षित आशियाना’?

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इस में सबसे बड़ा राजनीतिक धमाका राघव चड्ढा के उस बयान से हुआ, जिसमें उन्होंने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले कई विधायकों के पार्टी छोड़ने और पंजाब के मुख्यमंत्री के भी भाजपा में जाने की संभावना जताई। जो बात विपक्ष पिछले एक साल से कह रहा था, आज पार्टी के ही एक प्रमुख चेहरे द्वारा पुष्टि किए जाने से ‘आप’ की संगठनात्मक नींव हिल गई है। यह बयान न केवल पार्टी की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है,

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बल्कि उन कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी तोड़ देता है जो कभी इनके बयानों को अपना आदर्श मानकर जनता के बीच गए थे। अब इस सारे घटनाक्रम के बाद देखा जाए तो राजनीति में जनता सर्वोपरि है। 2022 से जिन नेताओं ने भाजपा की नीतियों का पुरजोर विरोध किया, आज उन्हीं के साथ कदमताल करना जनता के लिए किसी धोखे से कम नहीं है। सवाल यह है कि जो नेता कल तक ‘आप’ के सिद्धांतों का राग अलाप रहे थे,

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क्या वे कल भाजपा के मंच से जनता को पुनः गुमराह कर पाएंगे? ऐसे में देश के नेताओं का यह ‘पालतू व्यवहार’ उन्हें यह सोचने पर मजबूर करेगा कि क्या उनकी पसंद के नेता सिर्फ अपने बचाव के लिए रंग बदल रहे हैं। या कारण कोई और है। ​लेकिन देखा जाए तो जनता जनार्दन सब समझती है, इस पूरे प्रकरण का दूसरा पहलू भाजपा का स्टैंड है। जिन नेताओं को भाजपा ने कल तक भ्रष्ट और अयोग्य कहकर कठघरे में खड़ा किया था,

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आज उन्हें गले लगाना क्या भाजपा की अपनी वैचारिक शुद्धता को प्रभावित नहीं करेगा? प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई तीखी टिप्पणियों के बाद इन नेताओं का स्वागत करना भाजपा के पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को भी असहज कर सकता है। अगर जनता को यह लगा कि भाजपा सिर्फ संख्याबल बढ़ाने के लिए ‘दागी’ नेताओं को पनाह दे रही है, तो 2027 के चुनावों में यह ‘आयातित राजनीति’ भाजपा पर ही भारी पड़ सकती है।

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वहीं सत्ता की राजनीति में ‘जीत’ का गणित तो समझ आता है, लेकिन ‘जनता’ का गणित बहुत पेचीदा होता है। जब नेता सिद्धांतों को छोड़कर अवसरवाद की राजनीति करते हैं, तो वे अस्थायी रूप से तो सुरक्षित हो जाते हैं, लेकिन जनता की याददाश्त में वे ‘अविश्वसनीय’ का लेबल चस्पा करवा बैठते हैं। आने वाले समय में 2027 के चुनाव यह तय करेंगे कि मतदाताओं ने इस ‘दलबदलू राजनीति’ को सबक सिखाया है या वे एक बार फिर इन वादों के मायाजाल में फंस गए हैं। यह केवल ‘आप’ या भाजपा की परीक्षा नहीं है, यह उस लोकतांत्रिक मर्यादा की परीक्षा है जिसे हम सबने वोट के अधिकार के जरिए सुरक्षित रखा है।

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