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Trump ने H-1B वीजा के नियमों में किया बदलाव, अब कंपनियों को देनी होगी 88 लाख रुपए की फीस,

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PTB Big न्यूज़ वॉशिंगटन : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने H-1B वीजा को लेकर बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। अब इस वीजा के लिए आवेदन करने वाली कंपनियों को 100,000 डॉलर (लगभग 88 लाख रुपये) की भारी-भरकम फीस चुकानी होगी। इस कदम का असर खास तौर पर छोटी टेक कंपनियों और स्टार्टअप्स पर पड़ेगा, जबकि बड़ी कंपनियों के लिए यह बोझ उतना भारी नहीं होगा। व्हाइट हाउस के स्टाफ सेक्रेटरी विल शार्फ ने कहा कि H-1B वीजा प्रोग्राम का काफी

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दुरुपयोग हुआ है। इसका मकसद है ऐसे हाईली स्किल्ड वर्कर्स को अमेरिका लाना, जिन्हें अमेरिकी कर्मचारी रिप्लेस नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी जोड़ा कि 100,000 डॉलर की फीस यह सुनिश्चित करेगी कि केवल वास्तव में योग्य और जरूरी टैलेंट ही अमेरिका में प्रवेश पाए। अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लूटनिक ने बयान में कहा, “अब कंपनियां किसी विदेशी को ट्रेन नहीं करेंगी। यदि ट्रेन करना ही है, तो अमेरिका की यूनिवर्सिटियों से ग्रैजुएट हुए लोगों को ट्रेन करें।

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हमारी जॉब्स लेने के लिए बाहर से लोगों को बुलाना बंद करें। टेक इंडस्ट्री H-1B वीजा पर सबसे ज्यादा निर्भर है। अमेजन ने 2025 की पहली छमाही में ही 10,000 से ज्यादा H-1B वीजा हासिल किए हैं। वहीं माइक्रोसॉफ्ट और मेटा को भी 5,000 से अधिक वीजा अप्रूव हुए हैं। बड़ी कंपनियां आमतौर पर हाई-स्किल्ड वर्कर्स के लिए भारी रकम खर्च करने में पीछे नहीं हटतीं, लेकिन छोटे और मिड-साइज बिजनेस के लिए यह फीस एक बड़ी चुनौती बन सकती है। 

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत H-1B वीजा पाने वालों में सबसे आगे है। 2024 में 71 प्रतिशत H-1B वीजा भारतीय प्रोफेशनल्स को मिले, जबकि चीन को सिर्फ 11.7 प्रतिशत। H-1B वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कंप्यूटर और आईटी सेक्टर में होता है, लेकिन इसका उपयोग इंजीनियर, शिक्षक, हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स आदि भी करते हैं। अब तक H-1B वीजा के लिए आवेदन करने की शुरुआती फीस 215 डॉलर थी, और आगे की प्रक्रिया में कुछ हजार डॉलर और देने होते थे।

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इनका भुगतान आमतौर पर कंपनियां करती थीं। हर साल 65,000 H-1B वीजा जारी किए जाते हैं, और एडवांस डिग्री वालों के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा होते हैं। वीजा आमतौर पर तीन से छह साल के लिए वैध होते हैं। H-1B वीजा के आलोचक कहते हैं कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियां खतरे में पड़ती हैं और कंपनियां सस्ते विदेशी वर्कर्स को चुनती हैं। वहीं समर्थक कहते हैं कि अमेरिका में कई स्किल्स की भारी कमी है और H-1B टैलेंट से इन गैप्स को भरा जाता है।